हे कृष्ण, अधर्म का घड़ा भरता रहा, और वो आख़िरी बूँद थी
जब धर्म पूछ के खून बहा
उन खूबसूरत वादियों में, जिसे तेरा ही स्वर्ग कहा
हे कृष्ण, अधर्म का घड़ा भरता रहा ।
इस धरती पर सब तेरे ही बंदे, लहू सबका है एक रंग में
फिर क्यों किया उन्होंने ऐसा, किसी की ज़िन्दगी, किसी की माँ, किसी का पुत्र उजड़ा
ना जाने कैसा अभद्र था वो मंज़र
इंसानों के भेष में राक्षसों ने जन्म लिया,
हे कृष्ण, अधर्म का घड़ा भरता रहा ।
कृष्ण एक बार फिर से बोले " यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥"
और सारे अधर्मियों का संघार करने मैं ख़ुद आया हूँ
झाँक के देखो हर उस इंसान में , जो देश की रक्षा में ख़ुद को नहीं देखता
कृष्ण बस मंदिरों में नहीं, हर उस व्यक्ति में जीवित है जो धर्म की स्थापना के लिए कर्म कर रहा है
झांक के देखो पार्थ अपने हर उस व्यक्ति में जिसने अपने कर्म को अपना धर्म चुना, जिसने इंसानियत को अपना धर्म चुना, जिसके लिए न्याय और नैतिकता ही सर्वोपरि है
कौन समझाये उन राक्षसों को, के धर्म वो नहीं जो हाथ के कलावे में झलक जाए या माथे के तिलक में सजता जाए ।
पर एक बार फिर से महाभारत होगा, और फिर से हर उस राक्षस का नरसंघार होगा जिसने अधर्म का शय लिया
हे पार्थ, एक बार फिर हर उस द्रौपदी के सम्मान के लिए,
फिर से मैं ख़ुद हूँ इस युद्ध में खड़ा ।
जिस धर्म को पूछ कर, कहीं नारियों के "सिंदूर" को मिटाया उन आतंकवादियों ने
आज वही सिंदूर से तिलक करो हर उस देश के सेनानी का
जो विजयी भव: का नारा लगाके अपने जीत का परचम लहराता रहा
नमन करती हूँ आज फिर एक बार, जिनका आभार कभी ना कम होगा ।।